मानव कब सर्वश्रेष्ठ बन जाता है

मानव कब सर्वश्रेष्ठ बनता है

मानव तब सर्वश्रेष्ठ बनता है जब उसे महत्वपूर्ण बनने की आकांक्षा होती है क्योंकि हमारे पूर्वजों में सर्वश्रेष्ठ बनने की आकांक्षा थी तभी तो सभ्यता का विकास हुआ क्योकि अगर उनके भीतर महत्वपूर्ण बनने की प्रबलता होती ही नहीं तो विकास की जो क्रिया हुई है वो कभी हो ही नहीं पाती महत्वपूर्ण बनने की यही आकांक्षा किसी को कुछ करने के लिए प्रेरित करती है जो विचार आपको महत्वपूर्ण बनने के लिए प्रेरित करता है असल में उसी विचार से आपकी पहचान होती है क्योंकि इतिहास महत्वपूर्ण बनने की लोगों की गाथाओं से पटा है जब आप जिंदगी जीना शुरू कर देते है तो आप एक पल का आनंद जीवन में लेने लगते हैं जब आप खुश रहने लगते हैं तो आप महत्वपूर्ण बन जाते हैं और धीरे -धीरे आपकी यात्रा श्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ की होने लगती है मानव जब अपने नैतिक मूल्यों से भी जब उपर उठने लगता है जब वो उन जिम्मेदारी को भी निभाने लगता है जो किसी और की जिम्मेदारी है समाज के कल्याण हेतु अपना सर्वत्र समर्पित कर देता है तब मानव अपने छवि से ऊपर उठने लगता है शून्य से सर्वश्रेष्ठ की यात्रा का शुभारंभ हो जाता है निर्थक से सार्थक की ओर बढ़ने लगता है

हमें जीवन में महत्वपूर्ण बनने के लिए कभी -कभी किसी की आलोचना को अपनी कमजोरी के रूप में नहीं बल्कि अपनी ताकत के रूप में देखना चाहिए अगर आप को सर्वश्रेष्ठ बनना है तो आपको समझना होगा की आप दूसरों की आलोचना करने से सदैव बचे बस अगर किसी को उसकी गलती बताना चाहते है तो आपका अंदाज भी ऐसा हो की सामने वाले को अपनी गलती सुधारने में खुशी हो जीवन मे अपने लंबे अनुभव को अगर बनाए रखना चाहते हैं तो सदैव खुद की कमियों पर काम करके लगातार सीखते रहने से मानव श्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ बन जाता है

जब मनुष्य मानवता के नजरिए से दुनिया को देखने लगता है जब दया प्रेम त्याग सत्य शांति आत्मविश्वास आत्मचिंतन से भी मनुष्य की गति आगे बढ़ने लगती है तो वो साधारण से महानता की ओर बढ़ने लगता है खुद के मूल्यों से दूसरों के मूल्यों का आंकलन नहीं करना और मानवता की दृष्टि से संसार के सभी सदस्यों को देखना ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति है जो मानव को निसंदेह ही सर्वश्रेष्ठ बनाता है जो आने वाले अनगिनत पीढ़ियों के लिए बेहतरीन मिसाल के रूप में सदैव उपस्थित रहते है

मानव के मुक्ति का मार्ग कब खुलता है

मानव के मुक्ति का मार्ग तभी खुलता है जब वो औरों के मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है जो लोगों के आंखों में सकारात्मक बदलाव उनके लिए उनके बेहतर जीवन और भविष्य को सार्थक करने के स्वप्न उनके नयनों में पिरोता है उनके सपने को पूरा करने में अपना सर्वत्र योगदान देता है तब मानव के मुक्ति का मार्ग स्वयं ही खुल जाता है और जो मनुष्य आंखों से सपने छीनते है अक्सर लोगों को अपने कठोर वचनों से व्यथित करते हैं लोगों की आशाओं को सदैव तोड़ने का कार्य करते हैं तो वैसे मनुष्य की मुक्ति कभी संभव नहीं होती उनको अपने अंतिम चरणों में बेहद पीड़ा का अनुभव करना पड़ता है

चिंता से मुक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है

चिंता से मुक्ति स्वयं के प्रयासों से पायी जा सकती है स्वयं को ये विश्वास दिलाना जो चिंता है उससे कहीं बड़ा मेरा आत्मविश्वास है और बिना प्रयास किए मैं कैसे इसके चुंगल में खुद को जाने दे सकता हूं मैं कोशिश करूंगा अगर मेरी हार होती है तो क्या हुआ मैं फिर दुबारा कोशिश करूंगा और मैं ये तब तक कोशिश करूंगा जब तक मैं भय को पराजित करके विजय प्राप्त नहीं कर लेता मानव के संकल्प की शक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं है इसलिए सदैव अपने आत्मविश्वास और मेहनत की ताकत से भय रूपी दानव को हम सदा के लिए पराजित कर सकते है

1. भय केवल मन का विकार है

2. भले की भावना और सत्यता मानवता के उच्य मूल्यों का सिद्धांत है

3. हार और जीत का अंतर हम स्वयं तय करते हैं

4. दूसरों के मुक्ति का प्रयास हमारे मुक्ति का मार्ग खोलती है

5. कर्म के सिद्धान्त पर जीवन का सिद्धांत चलता है

6. मानसिक दवाब हमारे आत्मविश्वास के सामने ठहर ही नहीं सकती है

7. जीतता वहीं है जो जीतना चाहता है

8. सर्वश्रेष्ठ मानव वो है जो सदैव अपने विचारों के द्धारा लोगों को प्रेरित करती रहता है

9. हर युग की हर नयी चुनौती होती है पर जीत का मंत्र सदैव एक ही होता है

10. हार हमारी निराशाओं का ही भाव है जो हमें जीत से वंचित करता है

मानव जब मानवता को सबसे ऊपर रखता है मानव मूल्यों के विकास के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी को स्वीकार करके उसके संदर्भ में दिन रात कार्यरत रहता है तब मानव सर्वश्रेष्ठ बनता है वो जीवन के हर रंग को इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह ही देखता है जिसके हर रंग को वो स्वीकार भी करता है अपितु उन रंगों को जीता भी है जो कार्य सदैव कल्याण की भावना उत्पन्न करें तो ये सर्वश्रेष्ठ बनने के पथ पर अग्रसर होना है जिसकी मंजिल नये परिवर्तन और सुख के रूप में प्रकट होती है मानवता का मूल्य औरों के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन करना है खुद के लिए सकारात्मक कार्य करना है जिससे हम समाज के लिए सकारात्मक सोच के साथ विकास के मार्ग पर प्रति पल बढ़ते चले जाएंगे और खुद को भी प्रेरित करें और लोगों को भी प्रेरित करें ताकि सब अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें और मानवता एक नयी उंचाई पर स्थित हो जाए

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