सूर्यवंशी राजा की अमर प्रेम कहानी|All time best love story in Hindi

मै तुम्हे जब भी आवाज लगाऊँ तुम आ जाना चाहे तुम कही भी रहो

सूर्यवंशी राजा जिसका नाम आदित्य देव है और उसकी रानी जिसके जैसी सुंदर स्त्री पूरे राज्य में नहीं है उनक नाम रानी चंद्रावती है दोनों में असीम प्रेम है यहाँ तक की आदित्य देव कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अपनी रानी चंद्रावती से सलाह मशवरा करता है आदित्य देव कभी किसी को आज तक मृत्यु दंड की सजा नहीं दी है उनका मानना है जीवन देने का अधिकार भगवान का है तो लेने का अधिकार भी भगवान का ही है वो बड़े सरल स्वभाव के सबसे प्रेम करने वाले वैसा ही स्वभाव चंद्रावती का है वो भी बिल्कुल सरल शांत स्वभाव की है दोनों कभी भी खुद को राजा रानी की तरह नहीं समझते वो दोनो बिल्कुल जमीन से जुड़े रहते हैं वहां की जनता भी खुशहाल है अपने राजा रानी दोनों से प्रेम करती है उस राज्य का नाम है सूर्यगढ़ वहाँ की जनता तथा उस राज्य के पशु पक्षी भी भूखे नहीं सोते है कोई वहाँ भूखा नहीं रहता है उस राज्य पर सूर्य देव की विशेष कृपा है उस राज्य में कोई शिकार नहीं करता है पशुओ का

प्रेम तो नीले आकाश की तरह है बस पल – पल फैलता ही जाता है

वहाँ उस राज्य के सभी निवासी पशु पक्षी जो भी वहाँ रहते हैं सब खुशहाल जीवन जी रहे थे आदित्य देव की शादी को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था जब से रानी चंद्रावती आयी थी उस राज्य में रानी बनकर राज्य की खुशी दोगुनी हो गयी थी एक दिन रानी चंद्रावती ने अपने महल के पीछे उनके बाग में जिसके चारो ओर बड़ी सी चार दीवारी थी वहाँ पर कार्य करते हुए लोगों को देखा जो उनके बगीचे की देखभाल किया करते थे माली थे गर्मी बहुत थी और वो काम करते करते धूप में थक गये थे और उन्हें बहुत प्यास लगी थी रानी चंद्रावती ने तुरंत सैनिकों से उन सबको पानी पिलाने के लिए कहा और रात में उन्होंने आदित्य देव से कहा हमारे महल के पीछे हमारे बगीचे की जो देखभाल करते हैं उन्हें बहुत तकलीफ होती है पानी पीने में हम चाहते हैं आप वहाँ एक कुआँ बनवा दे ताकि उन्हें जब भी प्यास लगे वो पानी पी सके राजा आदित्य देव ने उसी समय ये आदेश दिया कल सुबह से ही कुआँ खोदने का कार्य आरंभ किया जाए और बहुत ही विशाल और गहरा कुआँ होना चाहिए ताकि एक साथ बहुत से लोग यहाँ पानी पी सके राजा के एक सलाहकार थे जो उस राज्य की सेवा में हमेशा लगे रहते थे वो बहुत बूढ़े हो गये थे आदित्य देव उनसे हमेशा कहते आप अब आराम करे आप ने बहुत सेवा की है इस राज्य की लेकिन उनका उस वृद्ध व्यक्ति का नाम था संतति वो कहते थे मै अपनी अंतिम साँस तक इस राज्य की सेवा करूँगा

आदित्य देव रानी चंद्रावती की कोई बात नहीं टालते थे आदित्य देव सूर्यवंशी थे उनकी रानी चंद्रावती भी बहुत ऊंचे कुल की थी सारे वेद का ज्ञान था रानी को राजा आदित्य देव ज्यादा पुजा पाठ में रूचि नहीं लेते थे वे और उनकी रानी हर दिन सूर्योदय और सूर्यास्त के वक्त सूर्य देव को जल अर्पित करके उन्हें पूरा सम्मान देते थे कभी कभी आदित्य देव इस कार्य को करने का उनका मन नहीं होता था कभी कभी ऐसा होता था लेकिन रानी चंद्रावती उनसे कहती आप सूर्यवंशी है आप को ये करना ही होगा सूर्यदेव हमारे कुल देवता है तब राजा तुरंत रानी के साथ चले जाते सूर्य देव के स्वागत में

प्रेम भी तो सूर्य की तरह ही प्रकाश फैला देते हैं जीवन में

एक बार राज्य में किसी ने किसी परिवार के मुखिया की हत्या कर दी उसे पकड़कर राजा के पास लाया गया राजा बहुत दयालु थे वो बड़े से बड़ा अपराध भी माफ कर देते थे लेकिन इस बार परिवार के मुखिया की हत्या कर दी गयी थी अब उसका परिवार कौन चलाएगा जीविका कैसे चलेगी राजा ने उस पीड़ित परिवार की तरफ देखा फिर उन्होंने उस हत्यारे की तरफ देखा फिर उन्होंने कहा तुमने मुखिया को मार दिया इस परिवार के ये जानकर की हत्या करना पाप है और वो भी हमारे राज्य में उस हत्यारो को आज बहुत डर लग रहा था वो कांप रहा था राजा ने फैसला सुनाया जब तक ये पीड़ित परिवार है तब तक जीवन भर तुम इनका खर्च उठाओगे इनकी जीविका अब तुम चलाओगे यही तुम्हारा दंड है अगर राज्य से भागने की कोशिश की तो हम तुम्हें ढूंढ कर कठोर दंड देगे तभी उस परिवार ने उस हत्यारे के हाथ से अपनी जीविका का निर्वाहन अस्वीकार कर दिया तो राजा ने रानी की सहायता ली उन्होंने चंद्रावती से कहा आप इस परिवार को समझाएँ रानी चंद्रावती इतनी आकर्षक थी उनमें इतना आकर्षण था की उनकी बात कोई टाल नहीं सकता था उस परिवार ने राजा आदित्य देव की इस बात पर असहमति जताई उन्हें लग रहा था राजा अभी भी दया ही दिखा रहे है गुनहगार को दंडित ना करके ये कैसा न्याय है लेकिन जब रानी ने उन्हें समझा तो वो मान गये राजा रानी की इसी अदा पर फिदा रहते थे राजा आदित्य देव ने रात में रानी से पूछा क्या मैने बहुत ज्यादा दयाभाव दिखाया तब रानी ने कहा आप ने सही फैसला सुनाया अगर आप उसे मृत्यु दंड दे भी देते तो वो परिवार का मुखिया लौट कर तो आता नहीं उस परिवार की जीविका कैसे चलती इसी बहाने उस हत्यारे को अपनी भूल का एहसास हो जाएगा और वो परिवार अपनी जीविका के लिए संधर्ष नहीं करेगा वैसे भी हमारे राज्य में कोई भूखा नहीं सोता है राजा आदित्य देव को अब ऐसा अंदर ही अंदर लगने लगा था की उनकी यह उदारता उनपर किसी दिन भारी ना पड़ जाए

ये प्रेम हमारा है इसलिए सबसे अच्छा है

उन्होंने अपनी रानी को जब ये बात बताई तो रानी ने कहा आप जो करते हैं वही करते रहे सूर्य काले बादलो को देखकर अपना रास्ता कभी नहीं बदलता है राजा रानी की इसी बात पर ही तो रानी से और भी प्रेम करने लग जाते थे आदित्य देव की बस वही एक रानी थी उसके अलावा आदित्य देव ने कभी किसी को नहीं देखा था अगर आदित्य देव सूर्य के जैस दयावान थे तो रानी चंद्रावती चंद्रमा की ही तरह अत्यंत शीतल थी जिनके छांव में बड़े से बड़े पापी शुद्ध हो जाए एक दिन रानी चंद्रावती की एक दासी ने रानी से अनुरोध किया मेरा भाई पड़ोसी राज्य में रहता है वो अभी यहाँ आया है आप उसे दरबार में रखवा दिजिए राजा आदित्य देव से कहकर आप की बहुत कृपा होगी रानी चंद्रावती का भी हि्दय बहुत विशाल था उसने कहा ठीक है कल उसे भेज देना दरबार में तो उस

पर दासी ने कहा आपने महाराज से नहीं पूछा तो रानी ने कहा महाराज मेरी बात कभी नहीं टालते जो मैंने कहा उनसे वही होगा तुम कल उसे भेज देना लेकिन क्या वो भरोसे के लायक है वैसे वो कौन से राज्य में रहता है दासी ने कहा महारानी वो मेरा भाई है वो भरोसे के लायक नहीं रहता तो फिर आपसे क्यों कहती वैसे वो हमारे पड़ोसी राज्य चंदेलगढ़ से है रानी ने फिर कुछ नहीं कहा रानी चंद्रावती जानती थी चंदेलगढ़ सूर्य गढ़ से हमेशा इष्या रखता था वो राजा आदित्य देव की जनता के बीच लोकप्रिय और वहाँ की खुशहाली से बहुत जलता था

रानी चंद्रावती ने रात में राजा आदित्य देव को ये बताया मैने अपनी दासी को पहले आश्वासन दे दिया फिर पता चला उसका भाई हमारे पड़ोसी राज्य से है जो आपसे हमारे राज्य से हमेशा ईष्या रखते आया है राजा आदित्य देव ने कहा तुम ने कह दिया है तो ठीक है और हम उसे देख लेगे तुम चिंता क्यो करती हो उसे सचमुच में जीविका की आवश्यकता होगी इसलिए वो अपने राज्य को छोड़कर हमारे राज्य में आया है और हम सूर्यवंशी है हम सदा से देते आए हैं हर उस याचक को जो हमारे पास सहायता के लिए आता है बिना किसी भेदभाव के लेकिन फिर भी रानी का दिल घबरा रहा था रानी चंद्रावती को कही न कही ऐसा महसूस हो रहा था अंदर ही अंदर उससे बहुत बड़ी गलती हो गई है बस कुछ बुरा ना हो वो आज सूर्यदेव से संध्या पुजा में ये प्रार्थना कर रही थी अगले दिन उस दासी का भाई दरबार में राजा आदित्य देव के सामने आया राजा ने उसे देखा तो कहा तुम्हारी चाल बता रही है की तुम्हे काम की आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम्हारे चलने में एक अकड़ है जिस तरह तुमने दरबार में प्रवेश करके मुझ तक मेरे सामने चल कर आए तुम्हारे आंखों में मुझे एक चमक सी दिख रही है और तुम्हारे हाथ पर जगह जगह कटे का निशान ये तो तलवार से ही ऐसा जख्म के निशान रह जाते हैं कौन हो तुम

पंक्षी भी वही खुल कर उड़ते है जहाँ उन्हें कोई भय नहीं होता

दासी के भाई का नाम जयदेव था उसने जब आदित्य देव की आंखों में देखा तो वो सच में डर गया उसके हाथ पैर कांपने लगे उसने कहा मै पड़ोसी राज्य का जासूस हूँ पडोसी राज्य के राजा आपका अंत चाहते हैं आपके इस राज्य पर कब्जा चाहते हैं लेकिन मै ये नहीं चाहता मै सचमुच में उस राज्य से भाग कर आया हूँ मुझे जीविका की उम्मीद है आपसे आप मुझे एक मौका दे मै कभी भी आपसे और इस राज्य से गद्दारी नही करूँगा राजा आदित्य देव बहुत ही भावुक हि्दय के थे वो तो अपने दुश्मनों का भी भला चाहते थे इसलिए उन्होंने रानी चंद्रावती की बात की लाज रखने के लिए उसे दरबार में रहने का मौका दे दिया उसने कहा मै आपकी सेवा करना चाहता हूँ मुझे अपने सुरक्षा में तैनात कर लिजीए राजा आदित्य की उसको इसके लिए हां कहना जबकि दुश्मन को पहचान कर भी मौका देना बहुत बड़ी भूल साबित होने वाली थी एक भूल रानी चंद्रावती ने की थी और दूसरी भूल आज आदित्य देव ने कर दी आदित्य देव को वैसे किसी भी सुरक्षाकर्मी की आवश्यकता ही नहीं थी और ना उन्हें कभी पड़ती थी वो अपने पूर्वजों के परंपरा के अनुसार खुद ही इतने सक्षम थे क्योंकि उनके अंदर सूर्यवंशियो का खून बहता था सामने के युद्ध में उन्हें हराना असंभव था लेकिन अगर विश्वासधात और पीठ पीछे किए हमले से कौन बच पाया है जो आदित्य देव और महारानी चंद्रावती बच सकते थे जयदेव धीरे धीरे करके आदित्य देव का विश्वास जीतने की कोशिश करता रहा और अंदर ही अंदर उस राज्य को तबाह करने की योजना बनाता रहा कुछ दिनों में महल के पीछे जो कुएँ का काम चल रहा था वो पूरा हो चुका था कुएँ का निर्माण पूरा हो चुका था इसकी सूचना सबसे पहले महारानी चंद्रावती को दी गयी चंद्रावती बहुत खुश थी ये सूचना पाकर उन्होंने कहा वो स्वंय आदित्य देव को इसकी सूचना देंगी रानी चंद्रावती ने जाकर यह सूचना आदित्य देव को बहुत ही प्रसन्न होकर दी आदित्य देव ने कहा ये सब तो आपके वजह से ही संभव हो सका है आप के चेहरे की ये खुशी देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है एक सुकून सा महसूस हो रहा है इस खुबसूरत अवसर पर हम आपके लिए इस कुएँ के उद्घाटन के पहले एक बहुत बड़ी पुजा देगे सारी जनता को आमंत्रण देगे और उस कुएँ का पहला पानी आप ही पिएँगी हम आज बहुत खुश है आप ऐसे ही हमेशा खुश रहा करे हमे सूर्यदेव से बस इतना ही तो चाहिए आप और हमारी प्रजा हमेशा मुस्कुराते रहे एक शुभ मुहूर्त में हम जल्दी से जल्दी पुजा देगे हम आज ही पुजारी जी से पुछते है कौन सा दिन पुजा देनी है फिर आदित्य देव ने अपनी रानी चंद्रावती को मुस्कुरा कर गले से लगा लिया उनका प्रेम आज बहुत ही ज्यादा और भावुक कर देने वाला था रानी चंद्रावती ने कहा पुजारी जी के पास बाद में जाईयेगा अभी संध्या पुजन का समय हो गया है हमे सूर्य देव को विदा भी करना है भूल गये क्या आदित्य देव ने कहा धन्यवाद आपका आपने मझे याद दिला दिया मै तो सचमुच में भूल गया था हमे अब देर नही करनी चाहिए हमे सूर्यदेव के सामने अभी उपस्थित होना चाहिए ताकि हम आज उन्हें मुस्कुरा कर विदा कर सके आज संध्या पुजा में सूर्यदेव ने भी शायद उनके असीम प्रेम को महसूस किया था आदित्य देव ने कहा जब भी मै सूर्य देव को खुद से दूर जाता देखता हूँ हर संध्या तो मन करता है उन्हें मै रोक लूं कभी खुद से दूर ना जाने दूं कहूँ पुत्र के साथ कुछ दिन रहकर मुझे सेवा का अवसर दे मै और मेरी पत्नी आपका बहुत ख्याल रखेगें आप मत जाइए मुझे छोड़कर आज शायद सूर्यदेव ने आदित्य देव की पुकार सुन ली थी समय से थोड़ा देर बस कुछ पल रूक कर सूर्यदेव अस्त हुए रानी चंद्रावती ने कहा आप सूर्यदेव के इतने प्रिय है आपको ऐसे उदास होना अच्छा नहीं लगता सूर्यदेव कल सुबह में फिर आएंगे आप सूर्यवंशी राजा है आप को इतनी भावुकता शोभा नही देती आदित्य देव को रानी चंद्रावती ये कह रही थी लेकिन आदित्य देव की इस भावुकता को देखकर रानी चंद्रावती चाहती थी वो खुद को बस संभाल रही थी अगर रानी चंद्रावती भावुक होकर राजा के इस बेचैनी पर रो देती तो आदित्य देव को संभाल पाना मुश्किल होता आस पास उनके सेवक के नजरों में आदित्य देव को कमजोर ऐसे भाव से कोई देखे ये रानी चंद्रावती नहीं चाहती थी वो आदित्य देव से ज्यादा मजबूत थी लेकिन आदित्य देव ऐसे बिल्कुल किसी बच्चे की ही तरह से उनका दिल बहुत कोमल था दोनों महल में आ गये राजा आदित्य देव ने कहा हम पुजारी जी से शुभ दिन का महुरत लेकर आते हैं तब रानी चंद्रावती ने कहा आज मत जाइए सुबह चलेगे मै भी चलूँगी आदित्य देव तुरंत मान गये आदित्य देव आज रात में अपने मन की बात रानी चंद्रावती को बता रहे थे वो रानी चंद्रावती से कह रहे थे हम राज्य के पिता तुल्य है और आप माता तुल्य यहाँ के लोगों के लिए मै चाहता हूँ हमारे साथ सूरज देव की पुजा में अब तीसरा भी शामिल हो ताकि सूर्यदेव को भी ये देखकर अच्छा लगे रानी चंद्रावती ने फिर से खुलकर मुस्कुराया उनके इस मुस्कान के सामने सुनहरी चांदनी रात भी बहुत फीकी लग रही थी रानी चंद्रावती जितना सुंदर तो पड़ोसी राज्यों में भी दूर दूर तक कोई स्त्री चाहे वो शाही खानदान की हो या साधारण कोई उनके मुकाबले में नहीं था रानी चंद्रावती उच्च कुल की ब्रह्मण थी इसलिए चंद्रमा से भी सुंदर रानी का विवाह सूर्यवंशी राजा के सूर्य देव के नाम पर जिनका नाम रखा गया था आदित्य उनसे हुआ था

चांदनी भी फिकी सी है तुम्हारे सामने बिना तुम्हारे ये जीवन भी रूकी सी है



राजा आदित्य देव ने रानी चंद्रावती को शादी की पहली ही रात को सारे अधिकार दे दिए थे उन्हें कुछ भी करने के लिए कभी भी आदित्य देव से कभी पुछने की कोई आवश्यकता नहीं थी आज चंद्रावती और आदित्य देव बहुत खुश थे इस चांदनी रात में

अगली सुबह सूर्यदेव का स्वागत दोनों ने किया उसके उपरांत वो पुजारी जी के पास चल दिए बिना रथ के दोनों ऐसे ही चल दिए आदित्य देव ने किसी सुरक्षा कर्मी को नहीं लिया रानी को आदित्य देव पर पूरा भरोसा था की आदित्य देव के रहते कोई उनका अहित नहीं कर सकता है आदित्य देव और रानी चंद्रावती जहाँ से गुजरते लोग उनसे स्नेह ही बार बार जताते

राजा रानी ने किसी को निराश नहीं किया सबका स्नेह लेकर मंदिर पहुंचे वहाँ पुजारी जी ने अगले अमावस्या का दिन निकाला फिर दोनों महल लौट आए और भव्य पुजा की तैयारी करने लगे राजा आदित्य देव ने कुछ महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी जयदेव को भी लेकिन जयदेव के मन में कुछ और ही चल रहा था उसने शायद पूरी योजना बना लिया थी विश्वासघात करने की आदित्य देव के स्नेह का धूर्तता पूर्वक उत्तर देने के लिए समय नजदीक आ रहा था पुजा के एक रात पहले रानी चंद्रावती को एक अनजाना डर सता रहा था वो अंदर ही अंदर बहुत परेशान थी जब आदित्य देव ने कारण पुछा तो रानी चंद्रावती ने बताया मै नहीं जानती लेकिन मुझे बहुत डर लग रहा है राजा आदित्य देव ने कहा आप सूर्यवंशी राजा की रानी है और मेरे रहते आपको डर कैसे लग सकता है मै आपको हर खतरे से बचा लूंगा रानी चंद्रावती अनजाने भय से व्यथित थी वो राजा आदित्य देव के गले लग कर रोये जा रही थी आदित्य देव उन्हें समझा रहे थे कल तो आपकी ही खुशी के लिए हमने पुजा दी है आप बेकार में डर रही है सूर्यदेव

जहाँ प्रेम की सीमाएं पहुँच कर मुक्त हो जाती हमेशा – हमेशा के लिए

की कृपा से सब अच्छा होगा अगले दिन सूर्य उपासना से दिन की शुरुआत की राजा आदित्य देव और महारानी चंद्रावती ने वो महल के पीछे उस कुएं के पास पहुंचे जो बहुत गहरा था पंडित जी आ चुके थे पुजा की पुरी तैयारी हो चुकी थी सारा राज्य के लोगों का जैसे वहाँ जमावड़ा था महल का पीछे का फाटक खोल दिया गया था हर ओर एक अलग ही आनंद और उत्सव था राजा आदित्य देव और महारानी पुजा में व्यस्त हो चुके थे हर ओर मंत्र की ही आवाज़ गुंज रही थी उस दिन सुरक्षा पर किसी का कोई ध्यान नही था क्योंकि सारी प्रजा खुशियाँ मनाने शायद एक जगह एकत्र हो गये थे सौनिक भी वहाँ मौजूद से मगर सब असावधान पुजा में लीन तभी जयदेव और पड़ोसी राज्य की सेना ना जाने वहाँ पर कहाँ से आ गयी जयदेव को महाराज आदित्य देव ने सुरक्षा की जिम्मेदारी विश्वास करके सौंपी मगर उस विश्वासघाती सांप ने आखिर अपना रंग दिखा ही दिया चारो ओर से राजा और उनकी प्रजा घिर चुकी थी आदित्य देव पुजा से उठ गये उन्होंने अपनी तलवार निकाली और जो बचे सौनिक जो वहाँ मौजूद थे सबने युद्ध लड़ना शुरू कर दिया उस युद्ध में निहत्थे प्रजा बेवजह मारे जा रहे थे ये देख राजा आदित्य देव के अंदर सूर्यवंशियो का खून खौल उठा फिर राजा ने एक नजर आकाश में सूर्य देव की तरफ देखा और अपने सौनिक के साथ टूट परे उस दुश्मन दल पर इतना रौद्र रूप उन्होंने धारण कर रखा था दुश्मन सौनिक की लाशें बिछनी शुरू हो गयी तभी दुश्मनों के साथ आए जयदेव ने मरे हुए कुछ प्रजा के शव उस कुएं में फेक दिया पुजा खंडित हो गयी रानी चंद्रावती ये सब देखकर बिल्कुल बुत सी हो गयी राजा आदित्य देव ने जब ये देखा तो जयचंद और उसके उस दृष्ट साथियों को सदा के लिए सुला दिया अपनी तलवार से

जो अपनो की खुशी के लिए तैयार है युग को ही बदलने के लिए

राजा आदित्य देव और उनके सैनिक लड रहे थे तभी माहौल शांत हो गया एक बड़ी फौज दुबारा से ढ़ेरो सैनिकों के साथ राजा आदित्य देव पर जोरदार हमला कर दिया राजा आदित्य देव लड़ते रहे उनके सैनिक उनकी प्रजा आदित्य देव और रानी के सामने सब एक एक करके मार दिए गय अब राजा रानी उनके शुभचिंतक पुजारी जी भी इसका शिकार हो गये बस यही बचे राजा और रानी के सामने जो कुआँ उन्होंने लोगों की प्यास मिटाने के लिए बनाई थी उसी में एक एक करके उनकी प्रजा की लाशो को उसमें फेका जा रहा था रानी चंद्रावती ये देखकर बहुत रो रही थी आदित्य देव भी विश्वासघात और जलन की इस आग को देख रहे थे सूर्यास्त हो चुका था आज संध्या पुजन सूर्यदेव को राजा और रानी नहीं कर सके आदित्य देव व्यथित हो चुके थे ये सब देखकर बेवजह उनकी पुरी जनता उनके आंखों के सामने खत्म हो गयी वो किसी को बचा नहीं पाए सूर्यवंशी होने पर आज उन्हें खुद में धिक्कार हो रहा था वीर सामने से हर युद्ध जीत सकता है मगर विश्वासघात का युद्ध हर बार हार ही जाता है अब राजा समझ गये थे आगे क्या होगा और रानी चंद्रावती भी जो अब बहुत चिंतिंत थी इतना की अब वो कुछ बोल भी नही पा रही थी राजा आदित्य देव रानी से कुछ कहना चाहते इससे पहले ही रानी के हाथ में जंजीर बांध दी गयी राजा के हाथ पैर में जंजीर बांध दी गई रानी को कुएं के पास ले जाकर दुश्मन राज्य का राजा जोर जोर से हंस रहा था कुएं में देखकर रानी बस अपनी प्रजा की हालत पर रोये जा रही थी रानी ने शायद तभी समझ लिया था उस शैतान राजा का इरादा उन्होंने उस शैतान राजा से कहा मुझे मिलने दीया जाएं मेरे पति से आदित्य देव के लिए शैतान राजा ने एक मौत का खेल सोच लिया था आदित्य देव इस बार एक पति एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से अंतिम बार अपनी दिल की बात खुलकर कहते है

मैने तुम्हारी ना जाने कितने युगों तक तलाश की है

फिर कही तुम से मै मिल सका हूँ

अब ऐसा लगता है शायद ये वही युग है

जहाँ मेरी हर तलाश खत्म हो चुकी है

युगों की वो पीड़ा युगों का वो लम्बा सफर

युगों का वो अकेलापन

तुम्हारी आंखे मरने के बाद भी मुझे एक और जीवन दे देगी मै तुमसे क्या कहूँ बस मेरी बेबसी में भी तुम्हे देख कर ही सुकून मिलता है

युगों का वो कभी खत्म ना होने वाला दुख

ऐसा लगता है अब सब शायद सदा के लिए खत्म हो जाएगी

मै मुक्त हो जाऊँगा सदा के लिए

इस तिलिस्मी चक्र से

उस जाल से जिसमें मै कब से फंसा हूँ

हर युग में तुम्हारे नहीं होने के बाद भी

मैने सिर्फ और सिर्फ तुम्हे ही तो जीया है

हर वक्त मेरे बीते हर एक पल में

सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही छाप थी

बस तुम्हारी छाप थी

मेरे बीते हर युगों की हर एक धड़कन पर

सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही नाम लिखा था

जो सिर्फ तुम्हारे लिए ही तो बस धड़कता था

सदा से और अब भी सिर्फ तुम्हारे लिए ही तो धड़़क रहा है

क्या तुम्हे मेरे दिल की धड़कन सुनाई दे रही है

जिसने तब भी तुम्हे बहुत आवाज लगाई थी और

अब भी तुम्हे कितनी आवाज लगा रहा है

अब देखना है क्या तुम मेरी आवाज को तुम सुनती हो

या फिर इन आवाजो को एक सिर्फ एक गूंज की तरह

खो जाने देती हो जहाँ से ये आवाज

कभी लौटकर तो नहीं आ सकती मगर

हमेशा ये आवाज गूंजती ही रहेगी बस

तुम्हे ही केवल तुम्हे ही पुकारती रहेगी

ये प्रेम है कहानी हमारी अभी खत्म कहाँ हुई है अभी तो इस कहानी की बस शुरुआत है

हर युग की तलाश सिर्फ और सिर्फ तुम ही तो हो

रानी अब रो नहीं रही है उनके आंखों पर उन शब्दों को सुनकर एक हल्की सी चमक थी राजा रानी को अंतिम बार देखते हैं और रानी भी शायद अंतिम बार ही आदित्य देव को देखती है शायद दोनों एक दूसरे के गले लगकर खूब रोना चाहते हैं मगर राजा की आंखों में और रानी की आंखों में बस दर्द है तो बिछड़ने का राजा अपनी आंखों के आंसू रोक नहीं पाए अंतिम विदाई दी रानी चंद्रावती को रानी की आंख पथरा गयी थी अपने पति की ऐसी हालत देखकर वो कभी सपने में भी ये होगा सोच नही सकती थी उनका पति इतना लाचार होगा उनके सामने और चंद्रावती बस उस लाचारी को चुपचाप देखती रहेगी कुछ कर नहीं पा रही है अपने पति के लिए ये पीड़ा तभी आदित्य देव कुछ दूर आगे कुएँ से बढ़ते ही है की एक तेज छपाक सी आवाज आती है राजा आदित्य देव जब पीछे देखते हैं मुड़कर उनकी पत्नी उनकी प्रेमिका उनकी चंद्रमा की शीतलता उस लाशो से पटे भयानक गहरे कुएँ में कूदकर हमेशा के लिए खो गयी आदित्य देव भी अब उसी गहरे कुएँ में खूद जाने चाहते थे अपनी पत्नी को बचाने मगर उनके हाथ पैर दोनों बेड़ियों से बंधे हैं वो दौड़ने की कोशिश करते हैं पर मुंह के बल गिर जाते हैं अब वो क्या करेगे सब कुछ तो छिन गया उनसे उनका राज्य उनकी प्रजा और जो उनके जीवन का ज्योति थी अब वो भी बुझ चुकी थी ऐसा लगता है आज सूर्य यहाँ सदा के लिए अस्त हो गया अब सूर्य देव का कौन स्वागत करेगा सुबह और शाम वो परिवार सा स्नेह अब शायद उन्हें कल से फिर कभी ना मिले जो अपनापन उन्हें मिला था कभी शायद किसी लंबे इंतजार के बाद शायद कभी सूर्यदेव को देखने को मिले आज एक सूर्यवंशी राजा बिल्कुल असहाय था वो कुछ ना कर सका जिसके लिए उसने सब कुछ किया कभी उसकी इच्छा के विरुद्ध ना गये आज वो ही इस लाश से भरे गहरे कुएँ में कूदकर कोई संसार में ऐसा नहीं था आज जो आदित्य देव के दुख की सीमा को नाप सकता था अब वो जीकर भी एक पल क्या करेगे जिस आकाश में चांदनी ना हो उस आकाश में अकेला सूरज कभी अच्छा नहीं लगेगा लेकिन उनकी मौत तो उसी समय हो गयी जब उनकी चंद्रावती उसकी पत्नी उनकी प्रेमिका उनका सबकुछ उन्हें छोड़कर चला गया एक पत्नी से पति की ये हालत देखना असहनीय हो गई थी उसपर से उस पड़ोसी दुश्मन राजा की बुरी नजर उन पर थी दोनों ही हालत में शायद उन्होंने सूर्यवंश की बहू होने का दायित्व निभा दिया आसमान के सूरज को ऊंचा रखने के लिए चांदनी ने शायद खुद को ही जैसे बुझा दिया अब तो आदित्य देव के लिए मौत ही सबसे बड़ी दवा थी और जिंदगी सबसे बड़ा जहर आदित्य देव बस उस कुएँ को ही बस देखे जा रहे थे जिसमें अनगिनत लाशों में एक लाश अब उसकी थी जिसके लिए ये कुआँ बनवाया गया था जिसकी इच्छा से आदित्य देव को पहले पता होता वो अपनी पत्नी की इच्छा से जनता के लिए जो महल के बागो में काम करते हैं उनके लिए और अपनी पत्नी के लिए कब्र बनवा रहे हैं तो वो कभी ये कुआँ नहीं बनवाते उस शैतान राजा ने आज आदित्य देव को वैसे ही सैनिकों की निगरानी में वही छोड़ दिया तड़पते रहने के लिए खुद महल में चला गया आदित्य देव रात भर अपनी प्रजा अपनी पत्नी और अपनी गलती को जो सबसे भारी पड़ गयी इसे याद कर कर के रोते ही रहे अगली सुबह सुरज नहीं निकला अपितु भयंकर बरसात होने लगी ऐसी बरसात जो सब कुछ अब निगल जाने के लिए बेताब थी लगातार इतनी बारिश हुई की नदी ने बगावत कर दी थी ऐसी बाढ़ आई की सबकुछ अपने

साथ बहा कर ले गयी वो राज्य वहाँ के दुश्मन सौनिक वो दृष्ट राजा आदित्य देव को भी शायद नदी उनसे कह रही थी हमे पहले आना चाहिए था हमने आने में देर कर दी समूचा राज्य को नदी अपने साथ बहा ले गयी कोई भी नहीं बचा वो शैतान राजा और उसकी सेना सूर्य देव का ये क्रोध था जो टूटा था उन सब पर उस शैतान राजा और उसकी सेना पर अब वो राज्य ही नहीं था और ना ही अब सूर्य देव को अपने स्वागत और प्रस्थान के लिए अपने परिवार का इंतजार जिसे वो आकाश से सदा मुस्कुरा कर देखा करते थे सब कुछ खत्म हो गया सब

प्रेम हमने हमेशा साथ देने के लिए किया है चाहे जीवन के इस पार या जीवन के उस पार

कुछ शून्य हो गया हमेशा हमेशा के लिए आदित्य देव का क्या हुआ शायद कोई नहीं जानता है वो उस नदी के साथ हमेशा के लिए उसकी गहराई में चले गए या फिर कभी शायद दुबारा उस गहराई से निकलकर उस प्रेम की तलाश कभी दूबारा कर सके किसी और समय में किसी और युग में और इस बार हर तलाश हमेशा के लिए खत्म हो जाए हमेशा हमेशा के लिए

ये प्यार हमारा तुम्हारा है इसलिए इतना खास है

 माना जिंदगी खत्म हुई मगर फिर मिलेगे शायद

 कभी न कभी हम तुम ये मन में तो विश्वास है

ये प्यार हमारा तुम्हारा है इसलिए इतना खास है

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